गुरुवार, जनवरी 06, 2011

बीते वर्ष की दो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं

    2010 बीत गया है और एक नया वर्ष 2011 हमारे सामने है, प्रत्येक वर्ष जब साल की शुरुआत होती है तो हम सभी एक दूसरे को इस उम्मीद के साथ शुभकामनाएं देते हैं कि नया वर्ष हमारे लिए खुशियों से भरा होगा | इसी आशा से मैं सभी को नव वर्ष की शुभकामनाएं देता हूँ |

       प्रत्येक वर्ष की तरह बीता वर्ष भी अनेक अच्छी एवं बुरी घटनाओं का साक्षी रहा है | लेकिन निश्चित ही यह वर्ष अनेक घोटालों के खुलासों के लिए याद किया जायेगा | सर्वप्रथम राष्ट्रमंडल खेल घोटाला फिर आदर्श हाऊसिंग घोटाला उसके बाद सभी घोटालों का बाप 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला उसके बाद तो घोटालों के खुलासों की ऐसी लाइन लगी की किसी आम आदमी के लिए उन सभी घोटालों  का नाम याद रख पाना भी मुश्किल हो गया अब तो वह समय आ गया है की 'घोटाला समाचार' नाम से एक दैनिक समाचार पत्र का प्रकाशन भी किया जा सकता है| लेकिन इतना निश्चित है की इन सभी घोटालों की जांच में वर्तमान भारतीय रीति का पूरी तरह से पालन किया गया है और देश के साथ इतनी बड़ी गद्दारी करने के लिए मंत्रियों एवं सत्ता से जुड़े व्यक्तियों को सिर्फ अपने पद का त्याग करना पड़ा है जोकि मामला शांत होने पर उन्हें वापस भी मिल जायेगा | जांच में हो रही लेट -लतीफी और मंद गति को देख कर तो ऐसा लग रहा है कि सभी घोटालेबाजों को समय दे दिया गया था की इस दिनांक तक  आप अपना पूरा अवैध धन स्विस बैंकों में जमा करा दीजिये क्योंकि उस दिनांक के बाद आपके यहाँ सी.बी.आई. का छापा पड़ेगा |
   हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी तो आई.एस.ओ. द्वारा ईमानदारी का प्रमाणपत्र प्राप्त कर चुके हैं, अब उनको इस बात से क्या  फर्क पड़ता है की उनके मंत्रिमंडल में कितने बेईमान बैठे हैं| वे बिचारे कर ही क्या सकते हैं, अगर सोनिया मैडम नाराज हो जाएँगी, तो वो तो मनमोहन जी को हटाकर राहुल जी को मंत्रिमंडल का मानीटर बना देंगी इसी लिए मनमोहन जी बीच - बीच में सोनिया मैडम की खुशामद कर देते हैं |

     अमेरिका में 09/11 के हमले के दो महीने बाद हमारे देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था संसद में 13 दिसंबर 2001 को आतंकवादियों ने हमला कर दिया था जिसे  हमारे सुरक्षाकर्मियों ने साहस का श्रेष्ठतम प्रदर्शन करते हुए नाकाम कर दिया था, तथा कुछ सुरक्षाकर्मियों ने अपने प्राणों का उत्सर्ग करके हमारे देश की अस्मिता को बचाया था,लेकिन जहाँ एक ओर अमेरिका ने न्यूयार्क और पेंटागन में हमला करने वालों को कुछ ही समय में नेस्तनाबूद कर दिया वहीँ भारत में संसद में हमले का मुख्य आरोपी अफजल गुरु सालों पहले मृत्युदंड पाए जाने के बावजूद अभी तक जिन्दा है, यदि इस हमले में एक भी सांसद की मौत होती तो निश्चित ही हमले के मास्टरमाइंड को तुरंत सजा दे दी जाती लेकिन चूँकि मौत सुरक्षा कर्मियों की हुई है, इसलिए इस मुद्दे में अभी भी सिर्फ राजनीति की जा रही है | क्या भ्रष्टाचार और आरोप -प्रत्यारोप का खेल खेलने वाले राजनेताओं के सामने देश के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाले सुरक्षाकर्मियों की जिंदगी का कोई मूल्य नहीं है|


   गुजरे वर्ष में बहुत सी ऐसी घटनाएं हुई जोकि किसी भी सभ्य देश के लिए अत्यंत शर्मनाक एवं दुखदायी मानी जाएँगी | इनमें बहुत सी घटनाओं का जिक्र अनेकों बार किया जा चुका है इसलिए मैं दो ही दुर्घटनाओं की चर्चा करूँगा |
  प्रथम घटना --  07 जून 2010 को भोपाल गैस त्रासदी के साढ़े पच्चीस वर्ष बाद भोपाल की अदालत ने फैसला सुनाया जिसमें लाखों लोगों के जीवन को बुरी तरह दे प्रभावित करने तथा हजारों लोगों की जान लेने वाली इस भीषणतम दुर्घटना के 8 दोषियों को मात्र दो वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गयी जबकि इस दुर्घटना का मुख्य आरोपी यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन लिमिटेड के तत्कालीन सी.ई.ओ. वारेन एंडरसन को मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने दुर्घटना के चंद घंटों बाद ही पूरे राजकीय सम्मान के साथ उसके देश अमेरिका में भिजवा दिया था और आज वह अमेरिका में आनंद का जीवन व्यतीत कर रहा है| इस मामले में राजनीतिज्ञों , प्रशासनिक अधिकारियों, न्यायाधीशों सभी की भूमिका नकारात्मक रही | 13 अप्रैल 1919 को अंग्रेजी शासन की बर्बरता का सबूत मिला था जब अंग्रेज अधिकारी जनरल डायर ने जलियावाला बाग़ में शांतिपूर्ण सभा कर रहे लोगों को बिना चेतावनी दिए अंधाधुंध फायरिंग कर दी थी जिसमें दो हजार से अधिक लोगों की मृत्यु हो गयी थी लेकिन तब तो एक विदेशी सरकार हम पर शासन कर रही थी जबकि 1984 में तो हमारी खुद की सरकार थी पर हजारों हत्याओं के मुख्य दोषी को तो हमारे नेताओं ने सुरक्षित उसके देश पहुंचा दिया जबकि हमारी न्यायपालिका ने अन्य दोषियों को 26 साल बाद मात्र दो साल की कैद सुनाई, बची खुची क़सर भ्रष्ट नेताओं एवं अधिकारियों ने प्रभावितों को उचित मुआवजा तथा सुविधाएं न देकर पूरी कर दीं |  निश्चित ही यह दुर्घटना तथा उस पर ऐसा अन्यायपूर्ण  न्याय हमारे देश के लिए एक कलंक है |

   द्वितीय घटना --  इसी प्रकार एक अन्य दुर्घटना 30 नवंबर 2010 को घटी, यह दुर्घटना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण थी, जब भारत में स्वदेशी आन्दोलन के उत्प्रेरक, आजादी बचाओ आन्दोलन के प्रणेता एवं भारत स्वाभिमान संगठन के तात्कालीन सचिव राजीव दीक्षित जी की मृत्यु हो गयी | यह देश के लिए ऐसी हानि है, जिसकी पूर्ति वास्तव में संभव नहीं है, एक वैज्ञानिक होने के बावजूद उन्हें भारत के अतीत एवं वर्तमान के प्रत्येक पहलू की पूरी जानकारी थी, कोई भी व्यक्ति यदि उसमें जरा भी देश प्रेम की भावना है राजीव जी के विद्वतापूर्ण एवं चमत्कारिक भाषण को एक बार सुनकर उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था| चार -पांच माह पहले मुझको राजीव जी के भाषण को सुनने का सुअवसर मिला था जब वे मैहर आये थे | जब भी किसी समाज अथवा देश में बुराइयाँ बढ़ती हैं तो वहां पर एक महापुरुष का आगमन होता है जोकि उस समाज को सही दिशा देता है लेकिन लगता है की भारतमाता को यह मंज़ूर नहीं था इसीलिए उन्होंने हम सब के बीच से भारत के इस महान  सपूत को इतनी जल्दी वापस बुला लिया |
     पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है, मीडिया किसी भी देश के लोगों की आवाज होती है जोकि उस आवाज़ को संविधान के दूसरे स्तंभों तक पहुंचाती है लेकिन यदि यही मीडिया किसी मुद्दे पर चुप्पी साध ले तब तो आम जन असहाय हो जायेगा | इस दुर्घटना में मीडिया का कुछ ऐसा ही रवैया रहा है | राजीव जी की मृत्यु की खबर मुझ तक 05 दिनों बाद पहुंची थी वह भी किसी व्यक्ति के द्वारा | वर्तमान में भारत के सबसे विद्वान राष्ट्रभक्त की मृत्यु की खबर किसी भी समाचार चैनल तथा किसी भी समाचार पत्र में प्रकाशित नहीं हुई | यह बात कैसे संभव है कि बहुत सारे घोटालों का खुलासा करने वाली मीडिया को इस दुर्घटना की खबर नहीं लगी, क्या राजीव जी पत्रकारिता की परिधि के बाहर थे, क्या वे राष्ट्र प्रेम की उस सीमा को भी पार कर चुके थे जिस सीमा के आगे पत्रकारिता का स्वरूप बौना हो जाता है, मेरा मानना है की इस अर्थ प्रदान युग में बहुत से धन लोलुप एवं विदेश प्रेमियों का राजीव जी के स्वदेशी आन्दोलन से नुकसान हुआ होगा इसलिए यदि किसी एक समाचार पत्र या चैनल अथवा कोई एक मीडिया समूह अथवा मीडिया का एक विशेष वर्ग यदि इस खबर की अनदेखी करे तो बात समझ में आती है लेकिन यदि पूरा मीडिया ही इस खबर की अनदेखी कर रहा है तो उसका अर्थ यही है की कोई एक ऐसा तत्त्व है जोकि मीडिया द्वारा दी जा रही खबरों पर नियंत्रण रखता है, तथा अपने लिए हानिप्रद खबरों को आम जन तक पहुँचने से रोकता है | 
      राजीव जी की मृत्यु की खबर तुरंत किसी को नहीं लगने दी गयी तथा उनकी लाश का पोस्टमार्टम भी नहीं कराया गया तथा उसके बाद मीडिया की गहरी चुप्पी यह इशारा कर रही है की एक महीने पहले देश में एक बहुत बड़ी तथा सोची समझी साजिश रची गयी थी |
      जिस प्रकार से वीर विनायक दामोदर सावरकर ने काला पानी की 10 सालों की अति कष्टदायक सजा भारत की आजादी के स्वर्णिम सपने को देखते हुए भोग ली लेकिन भारत की आजादी के बाद महात्मा गाँधी की हत्या की साजिश रचने के आरोप में उन्हीं को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया गया था, उसी प्रकार भारत के स्वर्णिम अतीत को वापस लाने तथा भारत के सभी लोगों को खुशहाल बनाने की चाह रखने वाले राजीव जी ने अपने पूरा जीवन देश सेवा में लगा दिया लेकिन उनको भी ऐसी रहस्यमयी मौत लील ले गयी और हमारे मीडिया ने मुहँ बंद कर लिया |

   

2 टिप्‍पणियां:

  1. विचारणीय व् गंभीर पोस्ट.

    उत्तर देंहटाएं
  2. राजीव दीक्षितं जी के सम्बन्ध में मेरे विचार अब बदल चुके हैं, हालाँकि उनकी मृत्यु संदेहास्पद और बहुत अफसोसजनक रही है परन्तु इस घटना को वर्ष की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं में से एक कहना उचित नहीं है।

    उत्तर देंहटाएं