बुधवार, नवंबर 24, 2010

साइकिल एक्सप्रेस

   साइकिल चलाना अपने आप में एक विशेष अनुभूति होती है बशर्ते साइकिल चलाने वाले में इस विशेष अनुभूति का अनुभव करने की ललक हो |
       कुछ दशकों पहले जब गाँव अथवा छोटे दर्जे के शहरों में यदि कोई  व्यक्ति साइकिल खरीदता था तो उस व्यक्ति का दर्जा गाँव में बढ़ जाता था और वह साइकिल पूरे गाँव की शान होती थी  ( यह बात तो मैंने अपने बुजुर्गों से ही जानी है ) |
      पर अब जमाना बदल गया है ,दो पहिया वाहन तो अब अति पिछड़े गाँव में भी देखे जाने लगे हैं और चार पहिया वाहनों की भी बाढ़ सी आ गयी है | ऐसे समय में साइकिल को निम्न आय वर्ग का सूचक मान लिया गया है |
     अब मध्यम वर्ग एवं उच्च वर्ग के युवा एवं प्रौढ़  लोग तो साइकिल चलाने की सोच भी नहीं सकते अलबत्ता ये राहत की बात है की बच्चों के पास एक साइकिल अवश्य रहती है उनमें भी परंपरागत साइकिलों का स्थान रेंजर एवं स्टायलिश साइकिलों ने ले लिया है | परन्तु आधुनिकता के परिणाम स्वरूप 15-16 वर्ष के किशोर एवं किशोरियों में दो पहिया वाहन लेने की आकांक्षा जाग्रत होने लगती है |
    परन्तु अभी भी साइकिल चलाने में आनंद की अनुभूति करने वाले लोगों की संख्या इस देश में समाप्त नहीं हुई है , जैसे की साइकिल प्रेमियों के लिए बंगलुरु के शमीम रिजवी आदर्श हैं जो की विश्व की कठिनतम साइकिल स्पर्धाओं में से एक ''रेस एक्रोस अमेरिका'' में शिरकत कर चुके हैं तथा उन्होंने इस प्रतियोगिता  में पहुँचने के लिए 24 घंटों लगातार बिना रुके 700 किलोमीटर साइकिल चलाई थी |
    हम ज्यादातर मामलों में पश्चिम की अंधी नक़ल करते हैं परन्तु साइकिल के मामले में हम उनसे दूर ही रहना चाहते हैं | अमेरिका जैसे उन्नत देशों में साइकिल संस्कृति का उदय तेजी से हो रहा है , दुनिया के कई बड़े शहरों में साइकिलों के लिए अलग से ट्रैक एवं पार्किंग विकसित की जा रही है तथा लोगों को साइकिल संस्कृति से जोड़ने के लिए बसों में साइकिलों को समुचित रूप से टांग सकने के लिए विशेष प्रकार के कैरियर लगवाये जा रहे हैं |
  साइकिल चलाने के फायदे किसी के लिए भी अज्ञात नहीं हैं शारीरिक, पर्यावरणीय  एवं आर्थिक लाभ के साथ-साथ के मानसिक लाभ भी हैं यदि साइकिल प्रदूषण युक्त  शहरों से बाहर चलाई जाये तो प्रकृति से सीधे जुड़कर सभी प्रकार के  मानसिक तनावों से मुक्ति पायी जा सकती है
  मेरे ख्याल से मैंने साईकिल का काफी महिमामंडन कर दिया है, उम्मीद है की पाठक अपने विचारों एवं नई तथा दिलचस्प जानकारियों से मुझको अवगत कराते रहेंगे |

3 टिप्‍पणियां:

  1. devanshu jee, cyle hai bade kaam ki cheez, samay bhi bachati hai aur swasthay bhi rakhti hai. main pahad se hoon, yahan to ekka dukka hi cyle chalti hain, par school time mein mein aur kuch dost cycle chalte the. to hum to is karan bahut famous the kasbe mein. Chadai mein cyle khichne ke baad dhonkni ki tarah dhadkte dil ki dhadkanein aaj bhi yaad hain.

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  2. देवांशुजी आप का साइकिल प्रेम सिर आंखो पर. गला काट जिंदगी में हमारे जीवन मूल्य जब तेजी से बदल रहे हो तो साइकिल केसे बनी रह पायेगी. शहरों में साइकिलों के लिए अलग से ट्रैक एवं पार्किंग विकास एक मजाक सा लगता है. इस देश मे साइकिल गरीब, निसाहाय या फिर कंजूस की सवारी मानी जाती है. कुछ दिन हमने भी साइकिल चलाई थी और आफिस भी गये. पर इस दोरान जो झेला उसे फिर किसी दिन बयान करेगे. अभी तो फिलहाल बस इतना कह सकते है की इस देश के योजनाकारों और निंयताओं की नींद खुले और छोटे छोटे पर अति महत्वपूर्ण पहलुओं अप्र उनकी नजरे इनायत हो

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