बुधवार, जुलाई 31, 2013

साहित्य के रत्न - मुंशी प्रेमचंद

                 आज 31 जुलाई है, महीने का अंतिम दिन, नौकरीपेशा लोगों के लिए यह दिन पगार के इंतज़ार का अंतिम दिन होता है, तो वहीँ बच्चों के लिए विद्यालय में मासिक टेस्ट की चिंता का अंतिम दिन।  परन्तु साहित्य प्रेमियों के लिए यह दिन विशेष उत्साह का होता है क्योंकि आज वैश्विक स्तर के दो विशिष्ट उपन्यासकारों का जन्मदिवस है, प्रथम  उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंदजी का जबकि दूसरा हैरी पॉटर  की रचनाकार जे.के. रोलिंग का।

                  मुंशी प्रेमचंद के नाम से मेरा प्रथम परिचय कक्षा पांच में हुआ था जब हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल 'ईदगाह' कहानी में हामिद के चिमटा खरीदने के उद्यम ने मेरे बालमन को बहुत प्रभावित किया था। उसके बाद तो उनकी अनेक कहानियों को पढ़ने का अवसर मिला है,  उनकी लेखनी से कोई भी तात्कालीन  भावनात्मक एवं सामाजिक मुद्दा अछूता नहीं रहा है।     

               आज से 133 वर्ष पूर्व अर्थात 31 जुलाई 1880 को एक साधन सुविधा विपन्न घर में जन्मे मुंशी जी का अधिकाँश जीवनकाल आर्थिक दुरावस्था में ही बीता, बाल्यकाल में ही माता स्वर्ग सिधार गईं, पिता के दूसरा विवाह करने के बाद आईं विमाता ने उन्हें वह स्नेह न दिया जिसकी उन्हें आवश्यकता थी। शिक्षा प्राप्त करने हेतु वह अपने ग्राम लमही से कई किलोमीटर दूर बनारस पैदल नंगे पांव ही जाया करते थे पर कुछ समय बाद पिता की भी मृत्यु हो जाने पर उनपर घर के भरण पोषण की भी जिम्मेदारी आन पड़ी। उसी समय 15 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह भी कर दिया गया , परन्तु पत्नी के गुणवती न होने के कारण यह शादी कुछ वर्षों बाद टूट गयी। इसके बाद उन्होंने अपने सिद्धांतों के अनुरूप एक बाल विधवा से विवाह कर लिया। 133 वर्ष पूर्व अर्थात 31 जुलाई 1880 को एक साधन सुविधा विपन्न घर में जन्मे मुंशी जी का अधिकाँश जीवनकाल आर्थिक दुरावस्था में ही बीता, बाल्यकाल में ही माता स्वर्ग सिधार गईं, पिता के दूसरा विवाह करने के बाद आईं विमाता ने उन्हें वह स्नेह न दिया जिसकी उन्हें आवश्यकता थी। शिक्षा प्राप्त करने हेतु वह अपने ग्राम लमही से कई किलोमीटर दूर बनारस पैदल नंगे पांव ही जाया करते थे पर कुछ समय बाद पिता की भी मृत्यु हो जाने पर उनपर घर के भरण पोषण की भी जिम्मेदारी आन पड़ी। उसी समय 15 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह भी कर दिया गया , परन्तु पत्नी के गुणवती न होने के कारण यह शादी कुछ वर्षों बाद टूट गयी। इसके बाद उन्होंने अपने सिद्धांतों के अनुरूप एक बाल विधवा से विवाह कर लिया। 
             मुंशी प्रेमचंद जी का रचनाकर्म समाज के उत्थान हेतु समर्पित है, अपने जीवनकाल में उन्होंने 300 से अधिक कहानियाँ लिखी, अनेक उपन्यास लिखे, निबन्ध, पत्र आदि की संख्या तो हजारों में रही है। 

             अपने समस्त रचनाकर्म में मुंशी जी का जोर रूढ़ीवाद का विरोध, अंधविश्वास के उल्मूलन, शोषितों को शोषकों से बचाने का प्रयास एवं समाज को एक नयी दिशा दिखने का रहा है। उनकी एक कहानी 'मृत्युभोज'  समाज में व्याप्त उस परंपरा के स्याह पक्ष को सामने लाती हैं जिसमें एक गरीब परिवार के व्यक्ति  की मृत्यु होने पर जिस वक्त उस परिवार को समाज से सहायता की आवश्यकता होती है तब उसको पंडितों एवं समाज के ही लोगों को भोजन कराना पड़ता है, भले ही घर के ही बच्चे भूख से बिलख जाएँ। 

            इसी प्रकार मुझे एक और कहानी याद आ रही है 'बौड़म' ,इस कहानी का मुख्य पात्र एक संपन्न परिवार में जन्म लेता है पर वह बाहरी आडम्बरों से अछूता रहकर समाज का भला करना चाहता है, लेकिन लोग उसे बौड़म अर्थात पागल कहकर पुकारते हैं।  आज भी निःस्वार्थ भाव से सेवा करने के इच्छुक व्यक्ति को समाज अस्वीकार कर देता है।  आज भ्रष्टाचार एवं दहेज़ प्रथा सामाजिक स्वीकार्यता प्राप्त कर चुके है, यूँ तो बाहरी तौर पर लोग इनका विरोध करते हैं लेकिन अंदरखाने में इनसे लाभान्वित होने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते हैं। जन्म लेता है पर वह बाहरी आडम्बरों से अछूता रहकर समाज का भला करना चाहता है, लेकिन लोग उसे बौड़म अर्थात पागल कहकर पुकारते हैं।  आज भी निःस्वार्थ भाव से सेवा करने के इच्छुक व्यक्ति को समाज अस्वीकार कर देता है।  आज भ्रष्टाचार एवं दहेज़ प्रथा सामाजिक स्वीकार्यता प्राप्त कर चुके है, यूँ तो बाहरी तौर पर लोग इनका विरोध करते हैं लेकिन अंदरखाने में इनसे लाभान्वित होने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते हैं। 

          वैसे तो अभी भी मुंशी जी की कई कहानियाँ मन में विचरण कर रही हैं परन्तु अब कंप्यूटर की कुंजियों को आराम करने का भी वक्त देना चाहिए।  

                                            मुंशी प्रेमचंद जी को हार्दिक नमन. 

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